Manish Kumar

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Manish Kumar

 

Unemployed with kidney disease

A tough period in life only gets tougher when a door closes on you. I could almost see the big iron gates to a future close on me. It was a call from the Human Resources Department with a hard line, “Your continued absence from work breaks the employment rules. Long absence from work is beyond the specified leave period.”

I pleaded with them. At that time as it was important. I’m ashamed of it today. “Please can the company extend some of the benefits so I can get back my health. I need help and support at this juncture.”

It was a no.

What happened to that carefree and happy life? A good large family living together in Jharkhand in a household where being the youngest family members they showered me with love. After schooling I chose to continue education in Pune, and did my graduation there.

My cousin was in Pune so I lived with him under his loving care. To specialize further I registered for Masters in Business Administration in a renowned Pune Institute. Later I managed to get an employment in a renowned MNC. Life was almost how I wanted to live. Good supportive family, exciting professional life, so what more did I need!

Even before I was fully aware, changes happened in my personal life. It started with the graveyard shift starting at 2:30 AM to 11:20 AM. The odd working hours with less sleep, changed meal times to keep awake saw a gradual change in my eating patterns. I blamed it on inadequate sleep that disturbed my eating schedules. I had also lost all social connections and lack of interaction with friends and family, so communicated less.

I had severe pain while urinating and passed blood, with headaches disturbing my peace. Fear and lack of time made me self-medicate. How could I talk about blood in the urine? I became alone and finally when it became unbearable I shared it with my cousin who suggested meeting a doctor should be my priority. I ignored it till my parents were called to attend to my poor health.

We went to the nearby hospital for checkup. The doctor checked my blood pressure. It was shocking to see creatinine was double the normal range. Further checkup revealed I was with CKD stage 3-4.

For a very long I was hurt to be left on the crossroads. I was in a mess. My family ran between cities from Vellore to Ahmedabad to understand how to handle the sudden detection of kidney failure. I was showed a rulebook that said only my parents, brother or sister could donate. My parents were both diabetic and my sister had just become a mother.

My family collapsed under the shocking news and was heart- broken. Through our confusion we began the search for a good Doctor. Next on search would be a willing, eligible donor.

I had also resigned from my job to keep away from nagging office calls. Out of job meant all dreams of a career growth disappeared.

And then… there came a single beam of sunlight, a ray of hope, made me feel wanted again. A kind aunt came forward to give me her kidney. It is that precious moment of happiness that made me marvel about God. I was relieved.

While the testing process began I also started dialysis. I was detected as HCV +. It meant waiting for transplant till HCV virus was cleared. Another period of life suspended with tension.

With some medical treatment the HCV became negative and on a wonderful day life changed again as if showered with blessings. My kind-hearted aunt donated her kidney.

In the next few months I saw lots of hope and felt most loved. But in spite of precautions I got a urine infection after 5 months after the transplant. Though medicated for the infection it was off and on. Creatinine was fluctuating between 1.3 m/dl to 3.75 mg/dl.

A biopsy of my transplanted kidney showed that HCV virus had affected it. My creatinine was stable between 2-2.6mg/dl, but a doctor suggested that the virus would also affect my liver.

But God again came to my rescue. Through some Facebook friends I got help. A reputed doctor in Delhi helped me with some good medications for HCV virus. The six-month course saw HCV finally under control.

To me my career mattered the most. Though CKD was a life changing experience, what hurt me more was I was forced to quit from work when I needed it most. After my transplant when the new kidney became naughty, I thought I had lost all things precious in my life.

Thank God now I have a working kidney and I work in a Company. Life is fun again, but my lesson for life stays with me.

Manish Kumar

 
ज़िंदगी का कठिन दौर तब और भी कठिन हो जाता है जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं| मुझे साफ दिख रहा था कि मेरे भविष्य की ओर जाने वाला बड़ा सा मजबूत दरवाज़ा मेरे लिए बंद था| ह्यूमन रीसोर्स डिपार्टमेंट से एक कॉल आई थी जिसके शब्द बहुत कड़े थे,” काम से आपका लगातार लंबी छुट्टी पे जाना एंप्लाय्मेंट रूल्स के खिलाफ है| आपकी छुट्टी का समय आपको दिए गये समय से ज़्यादा है|”

मैने उनसे याचना की| जैसे उस समय ये ज़रूरी था| आज मुझे उस बात पे शर्मिंदगी महसूस होती है| “क्या कंपनी मुझे थोड़ा और बेनिफिट दे सकती है जिससे कि मैं थोड़ी सेहत सही करके काम पर वापस आ सकूँ? इस समय मुझे मदद की ज़रूरत है|”

उन्होने साफ मना कर दिया|

क्या हो गया था मेरी उस बिंदास और खुशहाल ज़िंदगी को| एक अच्छे ख़ासे बड़े परिवार के साथ मैं झारखंड में रहता था जहाँ परिवार में सबसे छोटा होने के कारण सभी मुझपर प्यार लुटाते रहते थे| स्कूल ख़त्म करके मैने पुणे में आगे पढ़ने का फ़ैसला लिया| वहाँ से मैने अपना ग्रॅजुयेशन पूरा किया| पुणे में मेरा कॅज़िन रहता था जिसके साथ मैं बड़े प्यार से रहा करता था| आगे की पढ़ाई करने के लिए मैने पुणे के जाने-माने इन्स्टिट्यूट से MBA करने का फ़ैसला किया| आगे चलकर मुझे एक MNC मे अच्छी नौकरी भी मिल गयी| ज़िंदगी बिल्कुल वैसी ही चल रही थी जैसी कि मैं जीना चाहता था| अच्छा सा प्यार करने वाला परिवार, बढ़िया सी नौकरी, और क्या चाहिए था?

लेकिन मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरी हँसती-खेलती ज़िंदगी पूरी तरह बदल गयी| ये सब कुछ उस घातक शिफ्ट की वजह से हुआ जो कि रात 2:30 बजे शुरू होती थी और सुबह 11:20 पे ख़त्म होती थी| असमय काम करना, कम सोना, और रात को जागते रहने के लिए खाने- पीने के समय में बदलाव आदि चीज़ों की वजह से मेरे ख़ान-पान की आदतें बदल गयीं| मैं नींद पूरी ना हो पाने को अपने ख़ान-पान की अनियमितता का दोषी मानने लगा| मैने दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताना भी कम कर दिया था और सामाजिक तौर पर सबसे मिलना-जुलना भी लगभग बंद हो गया था|

मुझे यूरिन पास करने में बहुत दर्द महसूस होता था, और खून भी आता था, साथ ही लगातार रहने वाला सरदर्द मुझे परेशन करता रहता था| समय के अभाव मे और साथ ही डर की वजह से मैं खुद ही दवाइयाँ लेने लग गया| आख़िर मैं यूरिन मे खून आने की बात किसी से कहता भी तो कैसे? मैं अकेला ही सबकुछ सहता रहा, और जब ये सब असहनीय हो गया तब मैने अपने एक कजिन से बताया, जिसने मुझे सलाह दी कि डॉक्टर से मिलना मेरी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी| मैं फिर भी ये सब नज़रअंदाज़ करता गया जबतक कि मेरे माता-पिता को मेरी खराब तबीयत के चलते बुला नही लिया गया|

हम पास के एक अस्पताल मे चेक-अप के लिए गये| डॉक्टर ने मेरा ब्लड प्रेशर चेक किया| वो देख कर हैरान थे कि मेरा क्रियेटिनिन लेवेल नॉर्मल से दोगुना था| आगे के टेस्ट्स मे पता चला कि मुझे CKD स्टेज 3-4 है|

मैने इतने लंबे समय तक इतना कष्ट सहा तो बस इस दोराहे पर पहुचने के लिए| मैने सब कुछ बर्बाद कर लिया था| मेरा परिवार वेल्लोरे से अहमदाबाद के बीच ये जानने के लिए भाग-दौड़ करता रहा कि अचानक पता चले इस किड्नी फेल्यूर का इलाज कैसे कराया जाए| मुझे एक रूलबुक दिखयी गयी जिसके अनुसार केवल मेरे माता-पिता, भाई या बहेन ही मुझे किड्नी दान कर सकते थे| मेरे माता-पिता दोनो को डायबीटीस था और मेरी बहेन अभी-अभी माँ बनी थी|

मेरा पूरा परिवार इस घटना से बुरी तरह से आहत था, सभी बिल्कुल टूट चुके थे| अपने इसी असमंजस की स्थिति मे हम अच्छे डॉक्टर की तलाश करने लगे| उसके बाद हमे एक अच्छे और इच्छुक डोनर को भी ढूँढना था| इसी बीच मैने अपनी नौकरी भी छोड़ दी जिससे कि ऑफिस से आने वाली फोन कॉल्स मुझे परेशान ना कर सकें| नौकरी छोड़ने का मतलब था कॅरियर मे ग्रोथ के सपने भूल जाना|

और तभी, मुझे अंधेरे मे हल्का सा उजाला नज़र आया, उम्मीद की एक हल्की सी किरण दिखाई दी, मुझे फिर से जीने की वजह मिल गयी| एक द्‍यालु स्त्री मुझे अपनी किडनी देने के लिए तैयार हो गयीं थीं| ये मेरे लिए मेरी ज़िंदगी का वो असाधारण पल था जिसने मुझे भगवान और उनके चमत्कार में विश्वास करना सिखा दिया| मैं बहुत सुकून महसूस कर रहा था|

जब टेस्टिंग वग़ैरह चल रही थी तभी मैने डाइलिसिस भी शुरू करवा लिया| टेस्टिंग मे मैं HCV+ पाया गया| इसका मतलब था कि जबतक कि HCV वाइरस को हटा नही लिया जाता, तब तक ट्रांसप्लांट नहीं हो सकता था| थोड़े समय के लिए ज़िंदगी में मुश्किलें फिर से आ गयीं थीं|

कुछ दिन दवाइयाँ चलने के बाद हुए टेस्ट में HCV नेगेटिव आया और, आख़िरकार एक दिन आया जब मेरी ज़िंदगी बदल गयी, जैसे कि किसी की दुआएँ असर कर गयीं थीं| उन दयालु स्त्री ने मुझे अपनी एक किडनी डोनेट कर दी|

आगे के कुछ महीनों में, मुझे बहुत सारी उम्मीदें नज़र आ रहीं थीं, बहुत सारा प्यार मिल रहा था| लेकिन हर तरह से सावधानी बरतने के बाद भी, मुझे ट्रांसप्लांट के 5 महीनों के बाद यूरिन इंफेकशॅन हो गया| दवाएँ चलते रहने के बावजूद मुझे बार-बार ये परेशानी हो जाती थी| क्रियेटिनिन लेवेल (Creatinine level) 1.3 mg/dl और 3.75 mg/dl के बीच घटता-बढ़ता रहता था|

मेरी ट्रांसप्लांटेड किड्नी की एक बायोप्सी हुई जिसमें पता चला कि HCV वाइरस की वजह से इंफेकशॅन हुआ है| इस समय मेरा क्रियेटिनिन लेवेल 2-2.6 mg/dl पर स्थिर था, लेकिन डॉक्टर का कहना था कि ये वाइरस मेरे लिवर को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकता है|

लेकिन भगवान ने मुझे दोबारा बचा लिया| एक फ़ेसबुक फ्रेंड के ज़रिए मुझे मदद मिल गयी| दिल्ली के एक प्रख्यात डॉक्टर ने कुछ अच्छी दवाइयाँ दे कर HCV वाइरस का इलाज किया| 6 महीने के बाद मुझे HCV से पूरी तरह छुटकारा मिल गया|

मेरे लिए मेरा कॅरियर सबसे ज़्यादा ज़रूरी था| हालाँकि CKD (chronic kidney disease) एक ज़िंदगी बदल देने वाला अनुभव था , लेकिन मुझे सबसे बड़ा दुख इस बात का था कि मुझे इसके चलते अपनी नौकरी को उस समय छोड़ना पड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी|

ट्रांसप्लांट के बाद, जब मेरी नयी किड्नी ने खेल भी दिखाने शुरू किए, तब मुझे लगा कि मैने ज़िंदगी कि सारी खुशियाँ खो दी हैं|

लेकिन भगवान का शुक्र है कि अब मेरे पास एक स्वस्थ किड्नी है, मुझे एक कंपनी मे नौकरी भी मिल चुकी है| ज़िंदगी मे फिर से खुशियाँ आ चुकी हैं, लेकिन ज़िंदगी का सिखाया हुआ सबक मैं हमेशा याद रखूँगा|

Manish Kumar

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